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एक बार सम्राट अशोका घुमने
के लिये निकले
उन्हें एक भिक्छुक दिखाई
दिया !वो उस भिक्छुक
के पास गए उसके
कदमो में अपना सिर
रख दिया ! यह देख
कर सम्राट अशोका के सेनापति को
अच्छा नहीं लगा की
अशोका इतने बड़े सम्राट
हो कर एक भिक्छुक
के कदमो मे अपना सर रख
दिए ! जब शाम को
सम्राट जब वापस अपने
महल में वापस आये
तो सेनापति ने सम्राट से
कहा ये आपने अच्छा
नहीं किया आप भारत
वर्ष के चकर्वर्ती सम्राट
है! आपको
एक भिक्छुक के कदमो मे
अपना सर नहीं झुकना चाइये था ! सम्राट अशोक
उस वक्त कुछ नहीं
बोले और आरामगाह के
तरफ चले गए !सुबह
जब सम्राट दरबार में आये तो उनके
हाथ में एक थैली
थी! वह थैली सेनापति
को देते हुए कहा
इसके अंदर चार सामान
है! जाओ शाम तक
इससे बेच कर आओ
! जब सेनापति ने थैली खोल कर देखा
तो उसमे चार सर
था! एक सर हिरन
का था, दूसरा सर
घोडा का था, तीसरा
सर भैसा का था,
और चोथा सर एक
आदमी का था !सेनापति
थैला लेकर बाजार चला
गया शाम तक तीन
सर बेच चूका था!
लेकिन आदमी का सर
कोई ख़रीदा नहीं !जिसे भी आदमी
सर बेचने की कोशिश तो लोग कहते
हम आदमी का सर
लेकर क्या करेंगे! अगर
खरीद भी लिया तो
सब कहेगे किसी का खून
किया होगा और मुझे
जेल भी हो जायेगा
! बहुत कोशिश के बाद भी
वह आदमी का सर
बेच नहीं पाया! अबतक
सेनापति को समझ में
आ गया था ये
आदमी कर सर किसी
काम का नहीं! ये
घमण्ड किसी काम का
नहीं है
आसमां
मैं उड़ने वाले परिंदे
को पता होता है
की आसमान मे बैठने की
जगह नहीं होती है
कहने
का मतलब ये है
की किसी का अहंकार
या घमण्ड उसके
विनाश का कारण होता
है
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